सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

वैचारिक लेख लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नई शिक्षा नीति- शिक्षा का नया रूप

शिक्षा नीति - एक नज़र जैसा की आप लोगों को पता ही है देश की सरकार ने 34 साल बाद देश के लिए बनाई एक नई शिक्षा व्यवस्था को लागू करने की तरफ एक कदम बढ़ा दिया है। अभी तक देश में वर्ष 1986 में अपनाई शिक्षा प्रणाली ही प्रचलित थी । वर्तमान सरकार ने सत्ता में आने के बाद 2014 से ही नई शिक्षा नीति के निर्माण पर जोर शोर से काम शुरू कर दिया था।  ड्राफ्ट बनने के बाद इस पर लोगों की राय मांगी गई जिस पर करीब 200000 लोगों ने प्रतिक्रिया दी और अंत में जो मसौदा बनकर तैयार हुआ वही अभी की शिक्षा नीति 2020 के रूप में जाना जाता है । यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि अभी सिर्फ ड्राफ्ट तैयार हुआ है। ड्राफ्ट तैयार होने और इसका नीति और कानूनी रूप लेने में अभी कई पड़ाव बाकी है। पुरानी नीति और नाइ नीति में क्या है अंतर!! नई नीति पुरानी नीति से पूरी तरह से भिन्न है । एक तरह से देखा जाए तो इसके अंदर नए जमाने के साथ शिक्षा व्यवस्था का तालमेल बनाए रखने का पुरजोर प्रयास किया गया है। जहां पुरानी नीति परीक्षाओं पर ज्यादा जोर देती हुई दिखाई देती थी वही नई नीति सीखने और स्किल डेवलपमेंट पर ज्यादा जोर देती ह...

वैचारिक लेख- मेरा घर मेरा विद्यालय सच्चाई और सफलता (एक नजर में)

 मध्य प्रदेश।  स्कूल शिक्षा विभाग   जुलाई यूं तो मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग अपने अतरंगी आदेशों के कारण हमेशा से ही सुर्खियों में रहा है। यहां पर शिक्षक पढ़ाने के अलावा 40 अन्य तरह के काम भी करते हैं और अंत में हर असफलता का ठीकरा भी उन्हीं के माथे मड दिया जाता है, और बेचारा शिक्षक मेहनत करने के बाद भी उसका फल तो दूर बदले में सिर्फ और सिर्फ बदनामी ही झेलता है ।  इसके पीछे प्रारंभिक तौर पर योजनाओं के क्रियान्वयन निर्माण में शिक्षकों की सहभागिता का ना होना है ।योजनाओं को बनाया तो बड़ी ही समझदारी से जाता है,लेकिन जमीन पर क्रियान्वयन सच्चाई के धरातल पर होता है तो यह उतना परिणाम नहीं दे पाते जितना कि इनसे उम्मीद की जाती है । आखिर ऐसा क्यों कभी किसी ने इस पर विचार किया है । मेरे ख्याल से तो नहीं !!  अगर किया होता तो आज प्रदेश ही नहीं देश की शिक्षा व्यवस्था भी इतनी नीचे नहीं गिरी होती देश के विद्यालयों को, जनकल्याणकारी योजनाओं का केंद्र बना दिया गया है। मुफ्त पुस्तक, मुफ्त खाद्यान्न,मुफ्त साइकिल,मुफ्त यूनिफार्म, स्कॉलरशिप और न जाने कितनी ही योजनाएं व...

मुफ्त की रोटियों से उपजा बवाल

मध्यप्रदेश। ये कैसी पत्रकारिता- आजकल पत्रकार बनना ओर उससे भी ऊपर पत्रकारिता को नीचे गिराना बहुत आसान हो गया है। पत्रकार, अपने मूल काम से हटकर ब्लैकमेलर ज्यादा हो गए है।  बहुत से ऐसे छोटे पत्रकार है जिनकी रोजी रोटी ऐसी ही कुकृत्यों से चलती है।  मामला उठा है भोपाल के एक अखबार के लेख से। इसमे शिक्षक समुदाय को लेकर बेहद   अपमानजनक टिप्पणी की गई हैै। शिक्षकों  की मर्यादा को कलंकित  करने का प्रयास इस अखबार ने किया है, जिसके कारण पूरे शिक्षक समाज में बेहद रोष व्याप्त है।  अखबार के लेख में शिक्षकों को 3 माह से मुफ्त की रोटी तोड़ने वाला बताया है जिस पर ही ये बवाल खड़ा हुआ है।   शिक्षक समुदाय ने इस पेपर की कतरन को वायरल कर लोगों को यह बताने का प्रयास किया है कि समाज में पत्रकारिता का स्तर कितना नीचे गिर चुका है।  इन पत्रकारों को यह भी पता नहीं कि वह जो लिख रहे हैं, उसका सच्चाई से कितना लेना देना है। जब इस संबंध में शिक्षकों से बात की गई तो उन्होंने इस लेख पर कड़ा विरोध जताया । उन्होंने बताया कि लॉकडाउन में सिर्फ शिक्षक ही घर नहीं बै...